Electoral Bond: चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई रोक, जानिए क्या था विवाद

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चुनावी बॉन्ड क्या है (What Is Electoral Bond Scheme)

राजनीतिक दलों को गोपनीय चंदा देने वाले चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. हम आपको बतायेंगे ये पूरा विवाद क्या है,  पहले समझिए चुनावी बॉन्ड क्या है. दरअसल चुनावी बॉन्ड (Electoral Bond) एक वित्तीय लेनदेन का बैंकिंग जरिया है, जिसका उपयोग राजनीतिक दलों को दान देने के लिए किया जाता है. राजनीतिक दल को चुनावी बॉन्ड प्राप्त करने के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत पंजीकरण कराना होगा.

चुनावी बांड को खरीदने वाले (दान करने वाले) की जानकारी गोपनीय रखी जाती है. जिस पार्टी को ये बॉंड जारी होता है वही इसकी मालिक होती है. देने वाले का नाम या किसी भी तरह की जानकारी इसमें दर्ज नहीं होती. इसलिए इसे एक गुमनाम (anonymous bond) बांड कहते हैं.

सरकार ने वित्त विधेयक 2017 में चुनावी बॉन्ड योजना पेश (Electoral Bond Scheme) की थी. 2018 में चुनावी बॉन्ड योजना को लागू किया. ये बॉन्ड वाहक वचन पत्र के समान हैं, जहां जारीकर्ता (बैंक) संरक्षक है और बॉन्ड धारक (राजनीतिक दल) को भुगतान करता है.

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की खात बातें और विवाद

  1. सरकार की अधिसूचना के मुताबिक चुनावी बांड एक वचन पत्र और एक ब्याज मुक्त वित्तीय लेनदेन का बैंकिंग साधन है. भारत का नागरिक या कंपनी ये चुनावी बॉन्ड खरीदकर अपनी पसंदीदा राजनीतिक दल को चंदा दे सकती है.

  2. इलेक्टोरल बॉन्ड में प्राप्तकर्ता का नाम नहीं होगा. इसकी वैधता केवल 15 दिनों की होगी, जिसके दौरान इसका उपयोग राजनीतिक दलों को दान करने के लिए किया जा सकता है, जिसकी जानकारी गोपनीय रहती है. चुनावी बॉन्ड पर विवाद का प्रमुख कारण ये था कि इसे सूचना का अधिकार कानून से बाहर रखा गया है.

  3. भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की निर्दिष्ट शाखाओं से 1,000, 10,000, 100000, 100000, 1000000 और 10000000 के गुणकों में किसी भी मूल्य के लिए चुनावी बॉन्ड खरीदा जा सकता है. बॉन्ड को एक पात्र राजनीतिक दल अधिकृत बैंक के साथ नामित बैंक खाते में ही कैश कर सकते हैं.

  4. चुनावी बॉन्ड की वैधता केवल 15 दिनों की होगा, जिसके दौरान इसका उपयोग केवल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की धारा 29A के तहत पंजीकृत राजनीतिक दलों को दान करने के लिए किया जा सकता है, जिन्होंने लोकसभा या विधान सभा के पिछले आम चुनावों में डाले गए वोटों का कम से कम एक प्रतिशत हासिल किया हो.

  5. योजना के तहत बांड जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के महीनों में प्रत्येक 10 दिनों की अवधि के दौरान खरीद के लिए उपलब्ध होंगे. लोक सभा के साधारण निर्वाचन के वर्ष में केन्द्र सरकार द्वारा 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि भी निर्धारित की जा सकती है.

 

चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक क्यों लगाई

सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी को इलेक्टोरल बॉन्ड की वैधता पर अपना फैसला सुना दिया. सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में चुनावी बॉन्ड को रद्द करते हुए इसे असंवैधानिक बताया.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड को गोपनीय रखना सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन है. राजनीतिक दलों को आर्थिक मदद के बदले कुछ और लेने की मंशा को बढ़ावा मिल सकता  है.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को सभी राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी देने का निर्देश दिया है.

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